पेगासस सॉफ्टवेयर क्या है और कैसे काम करता है ? | Pegasus in Hindi

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Pegasus Spyware in Hindi  : विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में विकास से मानव जीवन के कई दैनिक कार्य आसान हो गए । लेकिन इसके दुष्परिणामों को भी नकारा नहीं जा सकता है। आज के टाइम में इंटरनेट लोगो की लाइफ का एक अहम हिस्सा हो गया है। जहां एक तरफ इंटरनेट की मदद से इतने जटिल काम आसानी से चुटकियों में हो जाते है वहीं दूसरी ओर कई क्रिमिनल माइनडेड लोग डार्क वेब की सहायता से लोगो को नुकसान भी पहुँचाने में पीछे नहीं है । इसी इंटरनेट का एक दुष्परिणाम है पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware in Hindi ) । नमस्कार दोस्तो ! आपका स्वागत है Techchauraha ब्लॉग पर जहां हम नियमित रूप से तकनीक से संबन्धित महत्वपूर्ण आर्टिकल व जानकारी साझा करते है।

आज हम बात कारेंगे कि पेगासस सॉफ्टवेयर क्या है ( Pegasus Spyware Kya Hai ) और पेगासस स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर कैसे काम करता है?( How works Pegasus )। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) का इस्तेमाल कथित तौर पर भारतीयों या किसी भी देश के हाइली पोपुलर लोगो को टार्गेट या उनकी जासूसी करने के लिए किया जाता है।

बात 2019 की है जब WhatsApp ने भारत सहित दुनिया भर के 20 देशों में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों पर कथित तौर पर जासूसी करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेगासस स्पाइवेयर के लिए इजरायली स्पाइवेयर निर्माता NSO ग्रुप पर मुकदमा दायर किया। WhatsApp ने खुलासा किया कि उसने कई भारतीय उपयोगकर्ताओं से संपर्क किया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उनको पेगासस स्पाइवेयर का उपयोग करके अवैध जासूसी का लक्ष्य बनाया गया है। पेगासस के उपयोग पर लंबे समय से व्हाट्सएप साइबर हमले में संदेह किया गया था जिसे पहली बार 2019 में रिपोर्ट किया गया था।

आइए अब विस्तार से जानते है कि ये पेगासस सॉफ्टवेयर क्या है ( Pegasus Spyware Kya Hai ), लेकिन उसके पहले आपको बता दें  कि स्पाइवेयर सॉफ्टवेर क्या होते है ? ( Spyware Software in Hindi ) ।

 

स्पाइवेयर सॉफ्टवेर क्या होते है ? ( Spyware Software in Hindi )

Spyware Software in Hindi : स्पाइवेयर सॉफ्टवेर इस प्रकार के सॉफ्टवेर एप्लिकेशन ( इन्हे मालवेयर भी कहते है ) होते है जिसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति या यूजर की निजी जानकारी जैसे – फोटो , विडियो , टेक्स्ट मैसेज , व्हाट्सऐप मैसेज और काल्स इत्यादि को एक्सैस करने के लिए किया जाता है । इसको यूजर की जानकारी के बिना उसके मोबाइल फोन या कम्प्युटर/लैपटाप में डाल दिया जाता है और फिर इसी सॉफ्टवेर की मदद से यूजर के मोबाइल फोन या किसी भी डिवाइस की पूरी जानकारी या डाटा चुरा लिया जाता है और खास बात ये है कि इसका पता यूजर को बिलकुल भी नहीं चल पता है ।  

 

पेगासस स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर क्या है ( Pegasus Spyware Kya Hai )

Pegasus Spyware Kya Hai : पेगासस स्पाइवेयर किसी व्यक्ति विशेष की जासूसी करने वाले सॉफ्टवेर का ही एक प्रकार है , पेगासस स्पाइवेयर अब तक का सबसे एडवांस स्पाइवेयर है जो इसको अन्य सभी स्पाइवेयर से ज्यादा खतरनाक बनाता है । पेगासस स्पाइवेयर को इज़राईल की कंपनी NSO GROUP द्वारा डेवेलप किया है । यह कंपनी साइबर वेपन्स बनाने के लिए जानी जाती है । आपको बता दें NSO Group कंपनी कहती है कि वह Pegasus सॉफ्टवेयर को सिर्फ सरकार को ही बेचती है और इसके मिसयूज के लिए वह बिलकुल जिम्मेदार नहीं है ।

ऐसा माना जाता है कि इसे क्यू सूट (Q Suite) और Trident जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। पेगासस में कथित तौर पर Android और iOS दोनों उपकरणों में घुसपैठ करने की क्षमता है और यह टारगेट के मोबाइल उपकरणों में हैक करने के लिए कई तरीकों का उपयोग करता है, जिसमें zero-day attack का उपयोग करना भी शामिल है।

बताया जाता है कि पेगासस एक सफ़ेद रंग का ताकतवर घोड़ा होता है, जिसके बड़े बड़े पंख होते है, ग्रीक माइथोलोजी के अनुसार पेगासस की उत्पत्ति देवता पोसाएडन और मेडूसा से हुई ।

 

एनएसओ ग्रुप क्या है? ( NSO Group in Hindi )

NSO Group Kya Hai : एनएसओ समूह एक साइबर सिक्योरिटी कंपनी है जो निगरानी प्रौद्योगिकी ( Surveillance Technology ) में स्पेशलिस्ट है और दुनिया भर में Governments ( सरकारों ) और Law Enforcement Agencies ( कानून प्रवर्तन एजेंसियों ) को अपराध और आतंकवाद से लड़ने में मदद करने का दावा करती है। इसकी स्थापना 2010 में Niv Karmi, Omri Lavie और Shalev Hulio ने की थी ।

एनएसओ समूह बताता है कि 40 देशों में इसके कुस्टूमर्स है, हालांकि वह क्लाइंट गोपनीयता ( Client Privacy Policy ) का हवाला देते हुए उनमें से किसी की पहचान नहीं बताता है। कैलिफोर्निया में व्हाट्सएप द्वारा पहले के मुकदमे का जवाब देते हुए, एनएसओ ग्रुप ने कहा था कि पेगासस का इस्तेमाल अन्य देशों में सिर्फ सरकारों या उनकी सस्थाओं द्वारा किया जाता है।   

 

पहली बार कब सामने आया पेगासस स्पाइवेयर ( When start Pegasus Spyware Attack)

When start Pegasus Spyware Attack : 

  • पेगासस स्पाइवेयर पहली बार 2016 में सुर्खियों में आया जब संयुक्त अरब अमीरात में एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को उनके आईफोन पर एक एसएमएस लिंक द्वारा निशाना बनाया गया ।
  • इसके बाद साल 2017 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक मेक्सिको की सरकार पर पेगासस की मदद से मोबाइल की जासूसी करने वाला उपकरण बनाने का आरोप लगा था । रिपोर्ट के मुताबिक इसका इस्तेमाल मेक्सिको में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और भ्रष्टाचाररोधी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा था। मैक्सिको के जानेमाने पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी सरकार पर मोबाइल फोन से जासूसी करने का आरोप लगाते हुए इसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया था । न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस सॉफ्टवेयर की खासियत यह है कि यह स्मार्टफोन और मॉनिटर कॉल्स, टेक्स्ट्स और दूसरे संवादों का पता लगा सकता है. यह फोन के माइक्रोफोन या कैमरे को एक्टिवेट भी कर सकता है।
  • सितंबर 2018 में टोरंटो के सिटीजन लैब ने बताया कि पेगासस स्पाईवेयर इतना ज्यादा खतरनाक है कि यूजर के परमिशन के बिना वह फोन में इंस्टॉल हो जाता है और जासूसी शुरू कर देता है । सिटीजन लैब ने उस वक्त बताया था कि दुनियाभर के लगभग 45 देशों में यह स्पाईवेयर ऐक्टिव था ।
  • जैसा कि हमने आपको पहले भी बताया यह दोबारा फिर 2019 में चर्चा में आया जब व्हाट्सऐप के माध्यम से इसके मोबाइल को इनफेक्ट करने की खबरे आई ।
  • फिर मई 2020 में आई एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि एनएसओ ग्रुप ने यूज़र्स के फ़ोन में हैकिंग सॉफ्टवेयर डालने के लिए फ़ेसबुक की तरह दिखने वाली वेबसाइट का प्रयोग किया था । फ़ेसबुक के मुताबिक जिनके फ़ोन हैक हुए उनमें पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थे । समाचार वेबसाइट मदरबोर्ड की एक जांच में दावा किया गया था कि एनएसओ ने पेगासस हैकिंग टूल को फैलाने के लिए एक फेसबुक के मिलता जुलता डोमेन बनाया है । वेबसाइट ने दावा किया कि इस काम के लिए अमेरिका में मौजूद सर्वरों का इस्तेमाल किया गया. बाद में फ़ेसबुक ने बताया कि उन्होंने इस डोमेन पर अधिकार हासिल कर लिया है ताकि इस स्पाइवेयर को फैसले से रोका जा सके । हालांकि इस बार भी एनएसओ ग्रुप ने आरोपों से इनकार करते हुए उन्हें "मनगढ़ंत" ही बताया था ।

 

पेगासस स्पाइवेयर कैसे काम करता है ? ( How works Pegasus Spyware )

How works Pegasus : पेगासस द्वारा डिवाइस को एक्सैस करने का तरीका समय के साथ बदलता रहता है, साल 2019 तक इसे वॉट्सऐप मिसकॉल के जरिए भी फोन में इंस्टॉल किया जा सकता था । आईफोन में इसे iMessage बग का इस्तेमाल करके इंस्टॉल करवाया जाता था । इसे फोन की नई खामी जिसके बारे में फोन या सॉफ्टवेयर मैनुफैक्चरर कंपनी को पता नहीं होता है उसके जरिए फोन में इन्स्टाल किया जाता है ।

एक रिपोर्ट के अनुसार टारगेट के पास मौजूद रेडियो ट्रांसमीटर या रिसीवर के जरिए भी इंस्टॉल किया जा सकता है । इंस्टॉल होने के बाद ये स्पाईवेयर डिवाइस के मैसेज, कॉन्टैक्ट, कॉल हिस्ट्री, इमेल, ब्राउजिंग हिस्ट्री समेत कई जानकारी को सर्वर तक पहुंचाता रहता है । ये यूजर को फोन के कैमरा से रिकॉर्ड भी कर सकता है । टारगेट यूजर के कॉल को रिकॉर्ड भी इस स्पाईवेयर से किया जा सकता है । Pegasus से यूजर को GPS के जरिए ट्रैक भी किया जा सकता है ।

इसको इस्तेमाल करने का एक तरीका ये भी है कि जिस व्यक्ति की जासूसी करनी होती है, उसके फोन में सॉफ्टवेयर की मदद से सम्बंधित व्यक्ति के पास  SMS WHATSAPP पर कोई लिंक या वीडियो मैसेज भेजा जाता है । इस प्रक्रिया में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है, उस व्यक्ति की दिलचस्पी जिस विषय में अधिक होती है, उसी विषय से जुड़ा हुआ SMS या Whatsapp भेजा जाता है ताकि वह तुरंत क्लिक कर दे । क्लिक करते ही उस व्यक्ति का फोन रीमोट कंट्रोल पर ले लिया जाता है और यह रीमोट एक्सेस ट्रोज़न की तरह कार्य करता है । एक बार आपका फोन हैक होने के बाद कॉन्टेक्ट लिस्ट से लेकर आपके मैसेज, वीडियो , बातचीत, ईमेल, कॉल रिकॉडिंग आदि को बड़ी आसानी से देखा जा सकता है ।

साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेगासस टारगेट यूजर के एन्क्रिप्टेड ऑडियो सुनने और एन्क्रिप्टेड मैसेजेस भी पढ़ सकता है । एन्क्रिप्टेड ऐसे मैसेज होते हैं जिसकी जानकारी सिर्फ मेसेज भेजने वाले और रिसीव करने वाले को होती है और तो और जिस कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म पर मेसेज भेजा जा रहा, वो भी उसे देख या सुन नहीं सकती ।

फेसबुक द्वारा अदालत में दिए गए बयान के अनुसार ये मैलवेयर ईमेल, एसएमएस, लोकेशन ट्रैकिंग, नेटवर्क विवरण, डिवाइस सेटिंग्स और ब्राउजिंग हिस्ट्री डेटा तक भी पहुंच सकता है । यह सब उपयोगकर्ता की जानकारी के बिना होता रहता है । ये मैलवेयर पासवर्ड से सुरक्षित उपकरणों तक में पहुंचने की क्षमता रखता है. जहां इंस्टॉल किया गया उस डिवाइस पर कोई निशान नहीं छोड़ना, कम से कम बैटरी, मेमोरी और डेटा की खपत ताकि उपयोगकर्ता को संदेह पैदा न हो, जोखिम की स्थिति में स्वयं से अनइंस्टॉल होना, गहन विश्लेषण के लिए किसी भी डिलीट की गई फाइल को पुनः प्राप्त करने की क्षमता भी इस मैलवेयर में है ।

आपको बता दें वर्तमान समय में बताया जाता है कि किसी डिवाइस को एक्सैस करने के लिए डिवाइस के ऑपरेटिंग सिस्टम या किसी अन्य सॉफ्टवेर के किसी बग का भी सहारा लिया जाता है , जिस बग कि जानकारी सॉफ्टवेर निर्माता को भी नहीं होती है । इस टेक्निक में यूजर को किसी लिंक पर क्लिक करने की भी जरूरत नहीं पड़ती है , इसे " Zero-Click Attack" कहा जाता है । इस अटैक में यूजर को अपने एंड से कोई भी एक्शन परफार्म नहीं करना पड़ता है । इस वजह से यूजर को जरा भी पता चले बिना उसका डिवाइस एक्सैस कर लिया जाता है ।

 

पेगासस स्पाइवेयर से बचने के तरीके ( Prevention from Pegasus )

Pegasus spyware se kaise bache : अगर Pegasus spyware से बचने के तरीको की बात की जाए तो आपको बता दें कि अगर एक बार ये खतरनाक स्पाइवेयर आपके डिवाइस में इन्स्टाल कर दिया गया तो फिर आपके पास अपने डिवाइस को बदलने के अलावा और कोई अन्य रास्ता नहीं बचता है । इससे प्रभावित हो चुके लोगो को सलाह दी जाती है कि वो नए डिवाइस इस्तेमाल करें और जितनी जल्दी हो सके अपने महत्वपूर्ण खातो जैसे सोशल मीडिया अकाउंट्स , ईमेल अकाउंट , इंटरनेट बैंकिंग इत्यादि को बदल दें ।

सामान्य परिश्थितियों में कुछ सरल चीजे को आप ध्यान में रखा जा सकता है -

  • किसी भी ससपिसियस वैबसाइट पर अपनी निजी जानकारी दर्ज न करें ।
  • किसी अंजान वैबसाइट पर विजिट करने से पहले ये जरूर चेक कर लें कि वो वैबसाइट SSL Certified ( अर्थात वैबसाइट के स्टार्टिंग में HTTPS:// लगा है या नहीं  ) है या नहीं , अगर  SSL Certified हो तो ही कोई उस पर ठहरे या कोई जानकारी भरे।
  • पब्लिक प्लेसेस पर फ्री वाई-फ़ाई का इस्तेमाल न करें खासकर कोई बैंक का लेनदेन का करें ।
  • अपना डिवाइस पर लगातार सॉफ्टवेर अपडेट चेक करते रहे और लेटैस्ट अपडेट को अपने डिवाइस में इंस्टाल करें ।
  • इसके अलावा आप एंटी-स्पाइवेयर या एंटी-वाइरस जैसे ट्रस्टेड थर्ड पार्टी एप्स का इस्तेमाल करें ।

 

पेगासस स्पाइवेयर की कीमत ( Pegasus Spyware Price )

Pegasus Spyware Price : दोस्तो पेगासस स्पाइवेयर को इस्तेमाल करना बहुत महंगा होता है । न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2016 में बताया कि एनएसओ समूह ने ग्राहकों से केवल सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने के लिए $500,000 और 10 उपकरणों में आने के लिए $650,000 का शुल्क लिया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 10 Android उपकरणों में घुसपैठ करने पर एक एजेंसी को $650,000 खर्च होंगे ।

 

कैसे पता करें की आपके फोन में पेगासस स्पाइवेयर है या नहीं (How to detect Pegasus Spyware )

How To Check If Your Smartphone Is Infected With Pegasus Spyware : फोर्ब्स पर पोस्टेड एक आर्टिकल के अनुसार , सूचना सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में कम से कम 50 हजार डिवाइस संक्रमित हो चुके हैं। यह संख्या उल्लेखनीय रूप से अधिक नहीं लगती है, लेकिन पेगासस बहुत खतरनाक है ।

सूचना सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस स्पाइवेयर का इस्तेमाल टार्गेटेड सर्विलान्स के लिए किया जाता है। यह रैनडम उपकरणों को नहीं बल्कि केवल उन खास लोगों से संबंधित स्मार्टफ़ोन को संक्रमित करता है जिनकी गतिविधियाँ इस सॉफ़्टवेयर को नियंत्रित करने वालों के लिए रुचिकर हैं। प्रत्येक पेगासस लाइसेंस की कीमत सैकड़ों-हजारों डॉलर होती है, इसलिए निगरानी मुख्य रूप से उन लोगों पर की जाती है जिनके पास बहुमूल्य जानकारी होती है (उदाहरण के लिए, राजनेता, व्यापारिक नेता या प्रमुख प्रकाशनों के पत्रकार)।इसलिए आम जन को इससे ज्यादा घबराने की बात नहीं है।

पोस्ट में आगे बताया गया कि लोकप्रिय एंटीवायरस सॉफ्टवेर पेगासस स्पाइवेयर का पता नहीं लगा सकते क्योंकि यह मैलवेयर Zero-Day की कमजोरियों का फायदा उठाता है ( जिसके बारे में हमने ऊपर आपको बताया था  ) जो ऐसे बग्स है जो ऑपरेटिंग सिस्टम और एंटीवायरस एप्लिकेशन के डेवलपर्स के लिए अज्ञात हैं। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International ) ने एक यूटिलिटि डेवेलप की है जो आपको इस मैलवेयर की पहचान करने की परमिसन देती है। इसे MVT ( मोबाइल सत्यापन टूलकिट- Mobile Verification Toolkit ) कहा जाता है, और इसका स्रोत कोड GitHub पर उपलब्ध है।

एमवीटी यूटिलिटि एंड्रॉइड और आईओएस के साथ कॉमपैटिबल है, लेकिन एप्लिकेशन की इंस्टेंट इन्स्टालेशन के लिए कोई रेडी-मेड सोल्यूशंस नहीं है। उन्हें एक स्पेसिफिक डिवाइस के लिए कोंपइल्ड करने की आवश्यकता होती है, जो केवल Linux या macOS वाले कंप्यूटर पर ही किया जा सकता है।

यह यूटिलिटि कंप्यूटर पर स्मार्टफोन से डेटा की एक बैकअप कॉपी सेव करती है, फिर सभी डेटा को स्कैन करती है और जांचती है कि डिवाइस पेगासस स्पाइवेयर से संक्रमित है या नहीं, और यूजर को इन्फॉर्म करता है कि क्या उसके डिवाइस से जानकारी से समझौता किया जा सकता है और थर्ड पार्टी को ट्रांसफर किया जा सकता है।

यह यूटिलिटि , विशेष रूप से, डेटा ट्रांसफर लॉग को स्कैन करती है – यहाँ इन्फेक्टेड सिगनल्स सबसे अधिक पाए जा सकते हैं (कॉल हिस्टरी, एसएमएस, आईएम मैसेज और अन्य चीजों को दूर स्थित सर्वर पर भेजने के बारे में जानकारी)। आईओएस पर, ये लॉग एंड्रॉइड की तुलना में लंबे समय तक सेव होते हैं, इसलिए आईफोन पर पेगासस स्पाइवेयर का पता लगाना बहुत आसान है। मोबाइल सत्यापन टूलकिट को उपयोग करने की जटिलता को देखते हुए, इसको इंस्टेंट इन्स्टाल करने की दिशा में काम करना चाहिए और टेक्नालजी लवर यूजर्स या उन लोगों को प्रोवाइड की जानी चाहिए, जिन्हें संदेह है कि पेगासस उन्हें ट्रैक कर रहा है।

 

भारत में किसके फोन हुए हैक? ( Pegasus, India List )

Pegasus, India List : एक रिपोर्ट के अनुसार , कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा के मंत्रियों अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर उन लोगों में शामिल हैं, जिनके फोन नंबरों को इस इजराइली पेगासस स्पाइवेयर के जरिए हैकिंग के लिए लिस्ट किया गया था। एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संघ ने सोमवार को यह जानकारी दी।  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे तथा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद अभिषेक बनर्जी और भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अप्रैल 2019 में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली उच्चतम न्यायालय की कर्मचारी और उसके रिश्तेदारों से जुड़े 11 फोन नंबर हैकरों की लिस्ट में थे। गांधी और केंद्रीय मंत्रियों वैष्णव और प्रहलाद सिंह पटेल के अलावा जिन लोगों के फोन नंबरों को निशाना बनाने के लिये सूचीबद्ध किया गया उनमें चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीप छोकर और शीर्ष वायरोलॉजिस्ट गगनदीप कांग शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार सूची में राजस्थान की मुख्यमंत्री रहते वसुंधरा राजे सिंधिया के निजी सचिव और संजय काचरू का नाम शामिल था, जो 2014 से 2019 के दौरान केन्द्रीय मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी के पहले कार्यकाल के दौरान उनके विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) थे। इस सूची में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अन्य जूनियर नेताओं और विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का फोन नंबर भी शामिल था।

‘द गार्डियन’ की ओर से जारी इस बहुस्तरीय जांच की पहली किस्त में दावा किया गया है कि 40 भारतीय पत्रकारों सहित दुनियाभर के 180 संवाददाताओं के फोन हैक किए गए। इनमें ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘मिंट’ के तीन पत्रकारों के अलावा ‘फाइनैंशियल टाइम्स’ की संपादक रौला खलाफ तथा इंडिया टुडे, नेटवर्क-18, द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, सीएनएन, द न्यूयॉर्क टाइम्स व ले मॉन्टे के वरिष्ठ संवाददाताओं के फोन शामिल हैं। जांच में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर और जून 2018 से अक्तूबर 2020 के बीच एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार आठ कार्यकर्ताओं के फोन हैक किए जाने का भी दावा किया गया है।

 

भारत सरकार का क्या है पक्ष? ( India on Pegasus )

India on Pegasus Spyware : भारत सरकार ने जांच को खारिज करते हुए इसे पूरी तरह से बेबुनियाद करार दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ''इस तथाकथित रिपोर्ट के लीक होने का समय और फिर संसद में ये व्यवधान, इसे जोड़कर देखने की आवश्यक्ता है। यह एक विघटनकारी वैश्विक संगठन हैं जो भारत की प्रगति को पसंद नहीं करता है। ये अवरोधक भारत में राजनीतिक खिलाड़ी हैं जो नहीं चाहते कि भारत प्रगति करे। भारत के लोग इस घटना और संबंध को समझने में बहुत परिपक्व हैं।' उन्होंने कहा, "कल देर शाम हमने एक रिपोर्ट देखी, जिसे केवल एक ही उद्देश्य के साथ कुछ वर्गों द्वारा शेयर किया गया है।' सरकार ने कहा है कि भारत में अवैध ढंग से इस प्रकार की जासूसी कराना संभव नहीं है।

 

सारांश ( Conclusion )

उम्मीद करते है की पेगासस सॉफ्टवेयर क्या है? और पेगासस कैसे काम करता है? और पेगासस से कैसे बच सकते है ? ये आपको अच्छे से समझ आ गया होगा , अगर आपको कोई डाउट है या आप इस आर्टिकल से संबन्धित अपना कोई फीडबैक देना चाहते है तो नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते है। अगर आपको ये आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तो के साथ भी शेयर करें, धन्यवाद !



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